चित्त जागृति


This blog, NaughtAuthentic turned one on 15 January 2016. On the ocassion of it's first anniversary I have brought, for you, the very first of my verse written in Hindi during my teenage. Hope you will like it.

अनुपम रस के अन्त गति, तुम मेरे सुखात्मा
इस सुन्दर जग की महान कृति, तुम मेरे परमात्मा।

जब तुम न मिलो मेरे जीवन में, इस जीवन का अन्त निकट हो
तुमसे मिलकर ऐसा लगता, दूर सभी कष्ट-विकट हों

मेरे जीवन की सुन्दर छवि, तुम ही मेरी आत्मा
इस सुन्दर जग की महान कृति, तुम मेरे परमात्मा।

जब ढूँढ रहा था मैं तुझको, अम्बर के चादर के नीचे
तुम सोते थे मेरे मन में, अपनी सुन्दर आँखें मींचें

मेरे जीवन की प्राण-सुधा, तुम मेरी जीवात्मा
इस सुन्दर जग की महान कृति, तुम मेरे परमात्मा।

9 अगस्त 1989

© Copyrights reserved by the blog NaughtAuthentic and it’s owners.

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